काठमांडू, 04 मई। नेपाल के विपक्षी सांसदों ने सरकार के अध्यादेश लाने के फैसले का विरोध करते हुए आरोप लगाया है कि यह कदम संसद को दरकिनार करने और लोकतांत्रिक मानदंडों को कमजोर करने वाला है।
सिंहदरबार में सोमवार को प्रतिनिधि सभा की कानून, न्याय एवं मानवाधिकार समिति की बैठक में सांसदों ने कहा कि लगभग दो-तिहाई बहुमत होने के बावजूद अध्यादेश लाना लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ है। नेपाली कांग्रेस के सांसद मदन कृष्ण श्रेष्ठ ने सरकार से ऐसे कदम उठाने से बचने का आग्रह किया, जो विवाद को जन्म दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि इतिहास में अध्यादेश अक्सर विवाद का कारण बने हैं
और बिना संसदीय चर्चा के जल्दबाजी में अध्यादेश लाना लोकतांत्रिक परंपरा के विपरीत है। श्रेष्ठ ने यह भी कहा कि विधेयकों को संसदीय समितियों और पूर्ण सदन में उचित विचार-विमर्श के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए, ताकि सभी पक्ष इस प्रक्रिया में सहभागी बन सकें।
इसी तरह, सीपीएन-यूएमएल के सांसद सुहांग नेमबांग ने कहा कि अध्यादेश लाने और भूमिहीन नागरिकों से जुड़े मुद्दों को संभालने में सरकार की कमजोरी उजागर हुई है। उन्होंने सवाल उठाया कि स्पष्ट बहुमत होने के बावजूद सरकार संसद के माध्यम से पुराने कानूनों में संशोधन या उन्हें समाप्त करने में क्यों विफल रही। नेमबांग ने चेतावनी दी कि संसद को दरकिनार करने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मूल्यों, संसदीय मानदंडों और संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करती है।
उन्होंने यह भी कहा कि भूमिहीन समुदायों की समस्याओं के समाधान की आवश्यकता पर कोई मतभेद नहीं है, लेकिन समाधान संवैधानिक, कानूनी और मानवीय होना चाहिए। साथ ही उचित विकल्प और पुनर्वास की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। उन्होंने नागरिकों के अधिकारों से जुड़े मामलों में सरकार से संवेदनशीलता के साथ काम करने पर जोर दिया।







