सावन माह में विशेष की कड़ी में हम आपको भारत में स्थित भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों के बारे में बता रहे हैं। यह शिव शक्ति के वो 12 पवित्र स्थल हैं, जहां भगवान शिव स्वयंभू प्रकट हुए। इससे पहले, आपने प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ, दूसरे मल्लिकार्जुन और तीसरे महाकालेश्वर के बारे में पढ़ा। आज सावन के पहले सोमवार के दिन आपको बारह ज्योतिर्लिंगों में से चौथे ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर के बारे में अवगत करा रह हैं।
ओंकारेश्वर की महिमा
स्कंद पुराण, शिव पुराण और वायु पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में ओंकारेश्वर की महिमा का वर्णन मिलता है। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी के उत्तरी तट पर, इंदौर से लगभग 77 किलोमीटर दूर स्थित है। यह नदी के उत्तरी तट पर स्थित एकमात्र ज्योतिर्लिंग है । माना जाता है कि तीनों लोकों की रोज़ाना परिक्रमा करने के बाद भगवान शिव यहां विश्राम करते हैं। इसलिए, यहां भगवान शिव के सोने के लिए विशेष इंतज़ाम, अनुष्ठान और ‘शयन दर्शन’ की व्यवस्था की जाती है।
ओंकारेश्वर से जुड़ी हैं अनेक पौराणिक कथाएं
हिंदू परंपराओं के अनुसार, ओंकारेश्वर से अनेक पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं, जो इस ज्योतिर्लिंग की धार्मिक महत्ता को रेखांकित करती हैं। एक प्रचलित कथा के अनुसार, विंध्याचल पर्वतमाला के अधिष्ठाता देवता विंध्य ने अपने द्वारा किए गए पापों के प्रायश्चित के लिए भगवान शिव की कठोर आराधना की। उन्होंने एक पवित्र यंत्र की स्थापना की तथा रेत और मिट्टी से एक शिवलिंग का निर्माण कर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव दो ओंकारेश्वर और अमलेश्वर (ममलेश्वर) स्वरूपों में प्रकट हुए। मान्यता है कि जिस स्थान पर मिट्टी का शिवलिंग दिव्य रूप में प्रकट हुआ, वही आगे चलकर ओंकारेश्वर कहलाया।
वहीं, एक अन्य कथा का संबंध इक्ष्वाकु वंश के प्रसिद्ध राजा मंधाता से है, जिन्हें भगवान राम का पूर्वज माना जाता है। कहा जाता है कि राजा मंधाता ने इसी स्थान पर भगवान शिव की घोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर शिव ने ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिए। कुछ परंपराओं में यह भी वर्णित है कि मंधाता के पुत्र अंबरीष और मुचुकुन्द ने भी यहाँ कठोर तप किया था। इसी कारण इस पर्वत और द्वीप को मंधाता पर्वत अथवा मंधाता द्वीप के नाम से भी जाना जाता है। एक अन्य पौराणिक आख्यान के अनुसार, देवताओं और दानवों के बीच हुए भीषण युद्ध में जब दानवों की विजय होने लगी, तब संकटग्रस्त देवताओं ने भगवान शिव की आराधना की। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए और दानवों का संहार कर देवताओं को विजय प्रदान की। इस कथा के कारण भी ओंकारेश्वर को धर्म और अधर्म के संघर्ष में दिव्य संरक्षण का प्रतीक माना जाता है।
ओंकारेश्वर का संबंध आदि शंकराचार्य के जीवन से भी जुड़ा हुआ है। परंपरा के अनुसार, यहीं स्थित एक गुफा में उनकी भेंट अपने गुरु गोविन्द भगवत्पाद से हुई थी और उन्होंने उनके सान्निध्य में वेदांत का अध्ययन किया। यह गुफा आज भी ओंकारेश्वर मंदिर के निकट विद्यमान है और एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक तीर्थस्थल मानी जाती है। यहां आदि शंकराचार्य की प्रतिमा भी स्थापित है, जो उनके जीवन और अद्वैत वेदांत परंपरा की स्मृति को संजोए हुए है।
ओंकारेश्वर मंदिर
मंधाता में ओंकारेश्वर मंदिर नर्मदा नदी के बीच ‘ॐ’ के आकार के एक द्वीप पर स्थित है। ममलेश्वर (पुराना नाम अमरेश्वर) मंदिर दक्षिणी तट पर है। दोनों मंदिरों का महत्व बराबर माना जाता है। इन दोनों शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंग माना जाता है। इंदौर-खंडवा हाईवे पर खंडवा से 75 किमी दूर स्थित यह जगह हिंदुओं के लिए एक बहुत ही प्राचीन और पवित्र तीर्थ स्थल है। मंदिर परिसर में माता पार्वती और भगवान गणेश के मंदिर भी स्थित हैं।
ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार, इस मंदिर का मूल निर्माण 11वीं शताब्दी ईस्वी में मालवा के परमार शासकों द्वारा कराया गया था। परमारों के शासन के पश्चात इसका संरक्षण और प्रबंधन चौहान शासकों के अधीन आ गया। मध्यकाल में हुए मुस्लिम आक्रमणों के दौरान मंदिर को क्षति पहुंची और इसे लूटने तथा ध्वस्त करने के प्रयास किए गए। यद्यपि इन आक्रमणों से मंदिर को पर्याप्त नुकसान हुआ, फिर भी इसकी मूल संरचना पूर्णतः नष्ट नहीं हुई और यह किसी न किसी रूप में सुरक्षित बनी रही। बाद में 18वीं शताब्दी में होल्कर वंश के संरक्षण में मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया।
इस कार्य का आरंभ होल्कर राज्य की प्रथम रानी गौतमा बाई होल्कर ने कराया, जिसे बाद में उनकी पुत्रवधू अहिल्याबाई होल्कर ने पूर्ण कराया। अहिल्याबाई होल्कर ने भारत के अनेक प्राचीन तीर्थस्थलों के संरक्षण और पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिनमें यह मंदिर भी सम्मिलित है। औपनिवेशिक काल में यह मंदिर ब्रिटिश प्रशासन के अधिकार क्षेत्र में आ गया। भारत की स्वतंत्रता के पश्चात, वर्ष 1947 के बाद इसकी देखरेख और संरक्षण का दायित्व भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने स्थानीय प्रशासन के सहयोग से अपने हाथों में लिया। वर्तमान में यह मंदिर एक संरक्षित ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहर के रूप में संरक्षित है।
मान्धाता टापू में ही ओंकारेश्वर की दो परिक्रमाएं होती हैं – एक छोटी और एक बड़ी। ओंकारेश्वर की यात्रा तीन दिन की मानी जाती है। इस तीन दिन की यात्रा में यहां के सभी तीर्थ आ जाते हैं।
पूजा एवं कार्यक्रम
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग में जलाभिषेक, पार्थेश्वर पूजन, पंचामृत पूजन, नर्मदा आरती और नर्मदा पूजन जैसे कार्यक्रम किए जाते हैं। हर सोमवार को शाम को मंदिर परिसर से भगवान ओंकारेश्वर की शोभायात्रा शुरू होती है, जो शंकराचार्य मंदिर से होते हुए कोटितीर्थ घाट तक जाती है। पूजा-अर्चना के बाद, भगवान ओंकारेश्वर नाव की सवारी करते हैं और शहर का चक्कर लगाने के बाद मंदिर लौटते हैं। इस शोभायात्रा में सुंदर वेशभूषा पहने भक्त शामिल होते हैं और चारों ओर खुशी का माहौल होता है।
इसके अलावा, हर शाम कोटितीर्थ घाट पर पवित्र नर्मदा नदी की शाम की आरती की जाती है। वहीं, महाशिवरात्रि पर विशेष कार्यक्रम, शयन आरती और मंगल आरती के कार्यक्रम होते हैं।







