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बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना उतना ही जरूरी है, जितना उनके शारीरिक स्वास्थ्य का ख्याल रखना।

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बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना उतना ही जरूरी है, जितना उनके शारीरिक स्वास्थ्य का ख्याल रखना।

बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना उतना ही जरूरी है, जितना उनके शारीरिक स्वास्थ्य का ख्याल रखना। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनियाभर में 10 से 19 वर्ष की उम्र के लगभग हर सात में से एक किशोर को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या होती है। यह वैश्विक आंकड़ा है और इसमें केवल एंग्जायटी नहीं, बल्कि विभिन्न मानसिक विकार शामिल हैं। कई किशोरों की परेशानी पहचान में नहीं आती और उन्हें समय पर उपचार नहीं मिल पाता। ऐसे में बच्चों के व्यवहार, भावनाओं और दिनचर्या में आने वाले बदलावों को समझना जरूरी है। 

किशोरावस्था शारीरिक, भावनात्मक और सामाजिक बदलावों का दौर होती है। इस उम्र में परिवार का माहौल, स्कूल का अनुभव और दोस्तों के साथ संबंध मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, एंग्जायटी, अवसाद और व्यवहार संबंधी विकार किशोरों में बीमारी तथा अक्षमता के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। एंग्जायटी और अवसाद का असर स्कूल में उपस्थिति, पढ़ाई और सामाजिक संबंधों पर भी पड़ सकता है। इसलिए मानसिक परेशानी को समझने और सहायता लेने में झिझक बच्चों की मुश्किल बढ़ा सकती है।

हालांकि, हर चिंता को बीमारी मान लेना भी सही नहीं है। परीक्षा से पहले घबराहट, नए स्कूल में जाने की बेचैनी या किसी अपरिचित परिस्थिति में डर महसूस होना बच्चों के विकास का सामान्य हिस्सा हो सकता है। चिंता तब अधिक ध्यान देने योग्य होती है, जब वह बहुत तीव्र हो, लगातार बनी रहे या बच्चे को रोजमर्रा के काम करने से रोकने लगे। उदाहरण के लिए, परीक्षा की चिंता और चिंता के कारण स्कूल ही नहीं जा पाना अलग स्थितियां हैं। बच्चे की परेशानी का आकलन उसके जीवन पर पड़ रहे असर से करना चाहिए।

एंग्जायटी के संकेत हमेशा सीधे शब्दों में सामने नहीं आते। बच्चा लगातार परेशान दिखाई दे सकता है, छोटी बातों पर चिड़चिड़ा हो सकता है या बार-बार रो सकता है। कुछ बच्चों को पढ़ाई या दूसरे कामों में ध्यान लगाने में परेशानी होती है। वे अक्सर नकारात्मक बातें सोचते हैं और अनहोनी की चिंता करते रहते हैं। नींद आने में दिक्कत, रात में जागना, डरावने सपने तथा सामान्य से कम या ज्यादा खाना भी संभावित संकेत हैं। लेकिन इनमें से किसी एक लक्षण के आधार पर एंग्जायटी का निदान नहीं किया जा सकता।

मानसिक परेशानी शारीरिक शिकायतों के रूप में भी दिखाई दे सकती है। कुछ बच्चे बार-बार पेट दर्द या सिरदर्द बताते हैं, जबकि उसकी कोई स्पष्ट चिकित्सकीय वजह सामने नहीं आती। ऐसे लक्षणों को झूठ या बहाना कहकर टालना उचित नहीं है। पहले डॉक्टर से शारीरिक कारणों का मूल्यांकन कराना जरूरी है। बच्चे का दोस्तों से दूरी बनाना, खेलने में रुचि कम होना या पढ़ाई के प्रदर्शन में गिरावट भी व्यापक मानसिक स्वास्थ्य मूल्यांकन की जरूरत का संकेत हो सकता है। ये बदलाव केवल एंग्जायटी के लिए विशिष्ट नहीं हैं। बच्चों में एंग्जायटी किसी एक वजह से नहीं होती।

सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और जैविक कारक मिलकर इसकी संभावना को प्रभावित कर सकते हैं। परिवार में विवाद, स्कूल बदलना, किसी करीबी की मृत्यु, गंभीर बीमारी, दुर्घटना या स्कूल में बुलिंग जैसे अनुभव भी परेशानी से जुड़े हो सकते हैं। कुछ बच्चों में परिवार के किसी सदस्य को एंग्जायटी होने का इतिहास जोखिम बढ़ाता है। हालांकि, किसी घटना या पारिवारिक इतिहास की मौजूदगी का अर्थ यह नहीं है कि बच्चे को निश्चित रूप से एंग्जायटी होगी। व्यक्तिगत स्थिति को समझना आवश्यक है। अभिभावकों की पहली भूमिका बच्चे की बात ध्यान से सुनना है। उसकी चिंता को छोटा बताने या बिना समझे निष्कर्ष निकालने के बजाय पूछें कि उसे किस परिस्थिति में परेशानी महसूस होती है। स्कूल से जुड़ी समस्या होने पर शिक्षक के साथ मिलकर समाधान तलाशा जा सकता है। नियमित दिनचर्या और आने वाले बदलावों के बारे में पहले से बातचीत बच्चे को सहारा दे सकती है। उम्र के अनुसार सरल विश्राम अभ्यास भी मददगार हो सकते हैं।

बच्चे को उसके डर का कारण समझे बिना अचानक तनावपूर्ण परिस्थिति में धकेलना परेशानी बढ़ा सकता है। यदि चिंता कम नहीं हो रही, बढ़ रही है या घर, स्कूल और मित्रता पर असर डाल रही है, तो बाल रोग विशेषज्ञ अथवा मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर से संपर्क करना चाहिए। उपचार बच्चे की उम्र, जरूरत और परेशानी की प्रकृति के अनुसार तय होता है। काउंसलिंग और कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी यानी सीबीटी सहायता के विकल्प हैं। सीबीटी बच्चे को चिंताजनक विचारों और उनसे जुड़े व्यवहार को समझने तथा संभालने में मदद करती है। कुछ गंभीर मामलों में विशेषज्ञ दवा की सलाह दे सकते हैं।

बच्चों को अपने स्तर पर एंग्जायटी की दवा देना उचित नहीं है मूल्यांकन के दौरान विशेषज्ञ बच्चे की भावनाओं, व्यवहार, स्वास्थ्य इतिहास तथा परिवार और स्कूल की जानकारी को साथ देखकर स्थिति समझते हैं। अभिभावक डॉक्टर को बता सकते हैं कि बदलाव कब शुरू हुए और किन परिस्थितियों में बढ़ते हैं। यदि बच्चा खुद को नुकसान पहुंचाने की बात करे या उसका व्यवहार तत्काल असुरक्षित लगे, तो तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें। समय पर पहचान और उचित उपचार बच्चों को लक्षण संभालने तथा भावनात्मक और सामाजिक जीवन में सहायता दे सकते हैं।

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