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शोधकर्ताओं ने असम के कुओं में मिलीं मछलियों की दोनों प्रजातियों के बारे में दो शोध पत्र प्रकाशित किए।


विज्ञान 29 October 2026
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शोधकर्ताओं ने असम के कुओं में मिलीं मछलियों की दोनों प्रजातियों के बारे में दो शोध पत्र प्रकाशित किए।

गोलपारा : एक दशक पहले, असम के गोलपारा जिले की रहने वाली विमारिथी के. मारक को अक्सर अपने पड़ोस के कुओं में एक छोटा गुलाबी जीव दिखाई देता था। उन्हें लगा कि यह बस कोई कीड़ा है जो उनके इलाके में पनप गया है। 2021 में, जब वह एक शोधकर्ता बन गईं, तो कुएं से पानी निकालते समय उन्हें फिर से वही जीव दिखा। वह बताती हैं, "इस बार मैंने इसकी तस्वीर अपने सुपरवाइजर को भेजी और हम इसका एक नमूना लैब ले आए। यह जीव दो सेंटीमीटर लंबी एक अंधी 'लोच' (मछली) निकली। इसका शरीर इतना पारदर्शी है कि इसके खून और अंदरूनी अंगों की वजह से यह गहरे लाल रंग की दिखाई देती है। पहला नमूना मार्च 2021 में मिला था।

हालांकि, आस-पास के अन्य कुओं में खोजबीन करने पर 'गिचक नाकाना' (Gitchak nakana) नाम की इस प्रजाति का कोई और नमूना नहीं मिला, लेकिन शोधकर्ताओं की टीम ने गांव वालों से कहा था कि अगर उन्हें अपने कुओं में कुछ भी असामान्य दिखे, तो वे मारक को जरूर बताएं।

काफी समय बाद, 2024 में, जब मारक के एक रिश्तेदार अपना कुआं साफ कर रहे थे, तो उन्हें वहां एक कीड़े जैसा जीव दिखा। वह बताती हैं, "मेरे रिश्तेदारों ने कुएं का सारा पानी निकाल दिया था, और तभी उन्हें जमीन के नीचे रहने वाली एक और प्रजाति का नमूना मिला।" 'रक्तमिचथिस एंची' (Rakthamichthys anchi) नाम की इस प्रजाति का पहला नमूना (होलोटाइप) मई 2024 में मिला, जिसकी लंबाई लगभग 310 मिमी थी। 'आर. एंची' (R. anchi) एक पतली, ईल (eel) जैसी मछली है, जिसके गुण 'गिचक नाकाना' से मिलते-जुलते हैं।

इसके बाद, इस साल की शुरुआत में शोधकर्ताओं ने इन दोनों प्रजातियों के बारे में दो शोध पत्र प्रकाशित किए। दोनों अध्ययनों की सह-लेखिका, कांगजाम वेलेंटिया बताती हैं कि जिन कुओं से ये नमूने मिले हैं, उन्हें बहुत साफ रखा जाता है और अक्सर पीने के पानी के लिए इस्तेमाल किया जाता है। वह आगे कहती हैं, "हमने जानबूझकर उस सटीक जगह का खुलासा नहीं किया है जहां ये मछलियां मिली हैं, क्योंकि हमें डर था कि कहीं इन मछलियों का गलत इस्तेमाल या दोहन न होने लगे।" 'रक्तमिचथिस एंची' के बारे में वेलेंटिया बताती हैं कि यह मछली 'सिनब्रांचिडे' (Synbranchidae) परिवार से आती है, जिसे आमतौर पर 'स्वैम्प ईल' (दलदली ईल) परिवार के रूप में भी जाना जाता है। 'आर. एंची' पर हुए अध्ययन के अनुसार, यह असम में पाई जाने वाली 'सिनब्रांचिड ईल' (synbranchid eel) की एक नई प्रजाति है, जो जमीन के नीचे (भूजल में) रहती है। 'फ्रीटोबायोटिक' जीव ऐसे जीवों को कहा जाता है जो ज़मीन के नीचे भूजल वाले वातावरण में रहते हैं, विशेष रूप से जलभृत (एक्विफर) के भीतर पानी से भरे स्थानों में पाए जाने वाले जीव।

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