Breaking News

नेपाल : सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों पर महाभियोग को लेकर सत्तारूढ़ आरएसपी में मतभेद


विदेश 02 November 2026
post

नेपाल : सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों पर महाभियोग को लेकर सत्तारूढ़ आरएसपी में मतभेद

काठमांडू, 02 नवंबर । नेपाल की सत्तारूढ़ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के आचरण पर सवाल उठने के बाद उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने को लेकर आंतरिक चर्चा कर रही है। हालांकि, पार्टी ने अभी तक आगे की कार्रवाई को लेकर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है।

आरएसपी के प्रवक्ता जगदीश खरेल ने कहा कि न्यायपालिका से जुड़े मुद्दों का समाधान संसद के माध्यम से किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “यदि पूरे न्यायिक क्षेत्र का पुनर्गठन करना है, तो इसके लिए संसद ही संवैधानिक माध्यम है। प्रक्रिया संसद के जरिए आगे बढ़नी चाहिए।”

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों और विवादित व्यक्ति इनम सापकोटा के बीच संबंधों तथा संदेशों के आदान-प्रदान का खुलासा होने के बाद सवाल उठने लगे हैं।

बताया जा रहा है कि सापकोटा के मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश, अन्य न्यायाधीशों तथा वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ संवाद और वित्तीय लेनदेन से जुड़ी जानकारियां सामने आई हैं। इसके अलावा सात न्यायाधीशों के एक साथ सापकोटा से मिलने की खबरें भी आई हैं।

इसी पृष्ठभूमि में सत्तारूढ़ आरएसपी औपचारिक और अनौपचारिक रूप से आगे की कार्रवाई के विकल्पों पर चर्चा कर रही है।

नेपाल के संविधान की धारा 101(2) के अनुसार, प्रधान न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों, न्याय परिषद के सदस्यों तथा संवैधानिक निकायों के प्रमुखों और पदाधिकारियों के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने के दो तरीके हैं।

पहला तरीका प्रतिनिधि सभा के कुल सदस्यों के एक-चौथाई द्वारा महाभियोग प्रस्ताव पेश करना है।दूसरा तरीका महाभियोग सिफारिश समिति के माध्यम से जांच शुरू करना है। इस प्रक्रिया के तहत कम से कम तीन सांसदों को महाभियोग की मांग करते हुए सूचना देनी होती है। इसके बाद समिति मामले की जांच करती है और उसकी रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई होती है।

संसद में महाभियोग की प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू होते ही संबंधित पदाधिकारी जांच प्रक्रिया पूरी होने तक अपने पद के कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर सकते। यह पहला रास्ता है। इस प्रक्रिया के तहत संसद में महाभियोग की कार्यवाही शुरू होने पर संबंधित व्यक्ति को अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से रोक दिया जाता है।

हालांकि, संविधान में यह स्पष्ट नहीं है कि दूसरे रास्ते के तहत प्रक्रिया शुरू होने पर संबंधित पदाधिकारी अपने कर्तव्यों का निर्वहन जारी रख सकते हैं या नहीं। यानी जब कम से कम तीन सांसद महाभियोग की मांग करते हुए सूचना देते हैं और महाभियोग सिफारिश समिति जांच शुरू करती है, तब क्या स्थिति होगी, इस पर स्पष्ट प्रावधान नहीं है।

आरएसपी के सांसद इस बात पर बंटे हुए हैं कि पार्टी को संविधान में दिए गए दोनों विकल्पों में से किस रास्ते पर आगे बढ़ना चाहिए। पार्टी के भीतर चर्चा में मोटे तौर पर दो विचार सामने आए हैं—एक सख्त कार्रवाई के पक्ष में और दूसरा सतर्कता बरतने के पक्ष में।

सख्त कार्रवाई के पक्षधर सांसदों का कहना है कि जिन न्यायाधीशों के आचरण पर सवाल उठे हैं, उनके खिलाफ तत्काल कम से कम एक-चौथाई सांसदों को महाभियोग प्रस्ताव पेश करना चाहिए।

इस पक्ष का समर्थन करने वाले एक आरएसपी सांसद ने कहा, “महाभियोग प्रस्ताव ही पेश किया जाना चाहिए। यदि हम जांच या अन्य उपायों का विकल्प चुनकर नरम रुख अपनाते हैं, तो यह मुद्दा धीरे-धीरे खत्म हो सकता है।” उन्होंने कहा, “जब यह मुद्दा सामने आया है, तब नरम रुख अपनाने से पूरे न्यायिक क्षेत्र के पुनर्गठन की हमारी कोशिश की दिशा भटक सकती है।”

हालांकि, पार्टी के भीतर जल्दबाजी से बचने के पक्ष में भी काफी समर्थन है। आरएसपी सांसद मधु कुमार चौलागाईं का कहना है कि उचित कदम उठाने से पहले पार्टी को सभी साक्ष्यों की जांच करनी चाहिए। उन्होंने कहा, “अतीत में महाभियोग का इस्तेमाल राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए किया गया था। हम ऐसा नहीं कर रहे हैं।”

उनके अनुसार, पार्टी के भीतर यह विचार है कि इस बार शुरू की जाने वाली महाभियोग प्रक्रिया को इस तरह आगे बढ़ाया जाना चाहिए कि उसका स्पष्ट निष्कर्ष निकले। उन्होंने कहा, “महाभियोग प्रस्ताव लाने से पहले हमें सभी साक्ष्यों की जांच और मूल्यांकन करना चाहिए तथा एक समिति (महाभियोग सिफारिश समिति) गठित करनी चाहिए। हम इसी रुख का समर्थन करते हैं।”

नेपाल के संविधान के मुताबिक महाभियोग प्रस्ताव पारित करने के लिए प्रतिनिधि सभा में दो-तिहाई सदस्याें का समर्थन जरूरी है।

You might also like!


RAIPUR WEATHER