मुंबई। अडानी ग्रुप के शेयरों में हाल में आई तेज गिरावट के पीछे अब एक दिलचस्प वजह सामने आई है। समूह के बड़े विदेशी निवेशकों में शामिल **GQG Partners** की ओर से Adani Energy Solutions के शेयरों में भारी बिकवाली किए जाने की रिपोर्ट है। यह बिकवाली ऐसे समय हुई जब इंडेक्स रीबैलेंसिंग के कारण पैसिव फंड्स से बड़ी खरीद की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन अचानक बाजार में उम्मीद से कहीं ज्यादा शेयर आ जाने से मांग और सप्लाई का पूरा गणित बिगड़ गया। इसका असर केवल Adani Energy Solutions के शेयर पर ही नहीं पड़ा बल्कि MSCI रीबैलेंसिंग को ध्यान में रखकर पोजीशन बनाने वाले हेज फंड्स को भी झटका लगा।
मामला 31 अगस्त को MSCI इंडेक्स रीबैलेंसिंग से जुड़ा है। इसी दिन नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के क्लोजिंग ऑक्शन सेशन में असामान्य रूप से भारी कारोबार देखने को मिला। Adani Energy Solutions के शेयरों में अचानक बिक्री का दबाव इतना बढ़ गया कि शेयर इंट्राडे कारोबार में करीब 10 प्रतिशत तक टूट गया। इसके अलावा अडानी समूह की दूसरी कंपनियों के शेयरों में भी भारी उतार-चढ़ाव देखा गया। करीब 2.19 करोड़ शेयरों की बिक्री ब्लूमबर्ग से जुड़ी रिपोर्ट के मुताबिक क्लोजिंग ऑक्शन के दौरान एक इकाई ने Adani Energy Solutions के लगभग **21.92 मिलियन यानी 2.19 करोड़ शेयर** करीब 1,417 रुपये प्रति शेयर के भाव पर बेचे।
रिपोर्ट में इस बड़ी बिक्री को GQG Partners से जोड़ा गया है। इतनी बड़ी संख्या में शेयर अचानक बाजार में आने से पहले से मौजूद खरीद की मांग कमजोर पड़ गई। करीब 569 मिलियन डॉलर मूल्य के Adani Energy Solutions शेयरों में उस दौरान कारोबार हुआ। इस बड़े वॉल्यूम ने बाजार का ध्यान अपनी ओर खींचा और ट्रेडिंग रणनीतियों को प्रभावित कर दिया। GQG Partners का अडानी से क्या कनेक्शन? GQG Partners का नाम अडानी ग्रुप के निवेशकों के बीच बेहद महत्वपूर्ण रहा है।
जनवरी 2023 में अमेरिकी शॉर्ट-सेलर Hindenburg Research की रिपोर्ट आने के बाद अडानी समूह की कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट आई थी। समूह का बाजार मूल्य तेजी से घटा और निवेशकों के बीच चिंता बढ़ी। इसी मुश्किल समय में GQG Partners ने अडानी समूह की कंपनियों में बड़ा निवेश किया था। मार्च 2023 में इस निवेश ने बाजार का खास ध्यान खींचा क्योंकि उस समय बहुत से निवेशक अडानी शेयरों को लेकर सतर्क थे। यही कारण है कि GQG को बाद के वर्षों में अडानी समूह के महत्वपूर्ण विदेशी संस्थागत समर्थकों में देखा जाने लगा।
इस पृष्ठभूमि में GQG से जुड़ी बड़ी बिकवाली की खबर बाजार के लिए अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। क्या GQG ने अडानी से दूरी बना ली? बड़ी बिक्री देखकर यह निष्कर्ष निकालना कि GQG Partners ने अडानी समूह से पूरी तरह दूरी बना ली है, फिलहाल जल्दबाजी होगी। बड़े संस्थागत निवेशक नियमित रूप से अपने पोर्टफोलियो में बदलाव करते रहते हैं। किसी शेयर में हिस्सेदारी कम करने के पीछे वैल्यूएशन, पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग, निवेश सीमा या मुनाफावसूली जैसे कई कारण हो सकते हैं। इसलिए एक बड़ी ब्लॉक या ऑक्शन बिक्री को कंपनी के कारोबार पर नकारात्मक राय का निश्चित प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। GQG की अडानी समूह की विभिन्न कंपनियों में लंबे समय से महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रही है। ऐसे में किसी एक कंपनी में शेयर बिक्री और पूरे समूह से बाहर निकलने में बड़ा अंतर है। MSCI रीबैलेंसिंग ने क्यों बढ़ाई हलचल? इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए MSCI इंडेक्स रीबैलेंसिंग को समझना जरूरी है। MSCI दुनिया के प्रमुख इंडेक्स प्रदाताओं में शामिल है। बड़ी संख्या में वैश्विक पैसिव फंड्स और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स उसके इंडेक्स को ट्रैक करते हैं। जब MSCI किसी कंपनी का इंडेक्स में वजन बढ़ाता है या नई कंपनी शामिल करता है तो उस इंडेक्स को फॉलो करने वाले फंड्स को भी उसी हिसाब से शेयर खरीदने पड़ सकते हैं। Adani Energy Solutions को MSCI रीबैलेंसिंग में फायदा मिलने की उम्मीद थी। इसलिए बाजार में पहले से यह अनुमान लगाया जा रहा था कि इंडेक्स ट्रैकिंग फंड्स की तरफ से शेयरों में अच्छी खरीद आएगी। हेज फंड्स ने क्या रणनीति बनाई थी? इंडेक्स रीबैलेंसिंग से पहले ट्रेडिंग करना बाजार की एक जानी-पहचानी रणनीति है। हेज फंड्स और दूसरे एक्टिव ट्रेडर्स कई बार ऐसे शेयर पहले खरीद लेते हैं जिनमें उन्हें बाद में पैसिव फंड्स की ओर से बड़ी खरीद आने की उम्मीद होती है। रणनीति सामान्य तौर पर काफी सरल दिखाई देती है। पहले शेयर खरीदो। इंडेक्स रीबैलेंसिंग के दिन जब पैसिव फंड्स को मजबूरी में शेयर खरीदने पड़ें तो बढ़ी हुई मांग के बीच उन्हें बेचकर मुनाफा कमाओ। लेकिन Adani Energy Solutions में कहानी उलटी पड़ गई। अचानक आई बिक्री ने बिगाड़ दिया खेल हेज फंड्स को उम्मीद थी कि MSCI रीबैलेंसिंग के कारण इंडेक्स ट्रैकिंग फंड्स से बड़ी खरीद आएगी और वे अपनी पहले से खरीदी गई होल्डिंग उन्हें बेच सकेंगे। लेकिन उसी समय GQG से जुड़ी बड़ी मात्रा में शेयर बिक्री बाजार में आ गई। यानी जिस मांग पर हेज फंड भरोसा कर रहे थे, उसके मुकाबले शेयरों की सप्लाई अचानक बहुत ज्यादा हो गई। इससे शेयर की कीमत ऊपर जाने के बजाय दबाव में आ गई और ट्रेडर्स की पहले से तैयार रणनीति बिगड़ गई। ब्लूमबर्ग आधारित रिपोर्ट के मुताबिक इस अप्रत्याशित सप्लाई ने हेज फंड्स की उन पोजीशंस को प्रभावित किया जो MSCI रीबैलेंसिंग से पहले बनाई गई थीं। ([HeadlinesBriefing][1]) 10% तक टूट गया Adani Energy Solutions भारी बिक्री का सीधा असर Adani Energy Solutions के शेयर पर दिखाई दिया। 31 अगस्त को शेयर में इंट्राडे आधार पर करीब 10 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। यह लगभग सात महीनों की सबसे बड़ी गिरावट में शामिल थी। हालांकि केवल GQG की कथित बिकवाली ही उस दिन बाजार की एकमात्र गतिविधि नहीं थी। MSCI इंडेक्स में बदलाव और NSE के नए क्लोजिंग ऑक्शन सिस्टम के कारण पूरे बाजार में असामान्य वॉल्यूम देखने को मिला। यही वजह है कि कीमत में आए उतार-चढ़ाव को कई फैक्टर्स के संयुक्त प्रभाव के तौर पर देखना ज्यादा उचित होगा। दूसरे अडानी शेयर भी टूटे उस दिन केवल Adani Energy Solutions दबाव में नहीं था। Adani Enterprises में भी इंट्राडे तेज गिरावट देखने को मिली। शेयर लगभग 8 प्रतिशत तक नीचे गया था। Adani Green Energy और Adani Power में भी 6 से 7 प्रतिशत के आसपास कमजोरी देखी गई, जबकि Adani Ports और Adani Total Gas भी दबाव में रहे। इतनी बड़ी एक साथ गिरावट ने बाजार में सवाल पैदा किए थे कि आखिर अडानी समूह के शेयरों में अचानक इतनी तेज बिकवाली क्यों हो रही है। अब सामने आई जानकारी से कम से कम Adani Energy Solutions में भारी सप्लाई का एक महत्वपूर्ण कारण समझ में आता है। NSE का नया Closing Auction Session भी चर्चा में इस पूरे घटनाक्रम में NSE का नया Closing Auction Session यानी CAS भी चर्चा में आ गया। Closing Auction Session का उद्देश्य दिन के अंतिम बाजार मूल्य को ज्यादा प्रभावी तरीके से निर्धारित करना है। इंडेक्स फंड्स और बड़े संस्थागत निवेशकों के लिए क्लोजिंग प्राइस खास महत्व रखता है। 31 अगस्त का MSCI रीबैलेंसिंग नए सिस्टम के लिए पहला बड़ा स्ट्रेस टेस्ट साबित हुआ। उस दिन CAS का कारोबार करीब **39,718 करोड़ रुपये** पहुंच गया, जो इसके शुरू होने के बाद सामान्य औसत से कई गुना ज्यादा था। इतने बड़े वॉल्यूम के कारण अंतिम कुछ मिनटों में शेयरों में असाधारण उतार-चढ़ाव देखने को मिला। पैसिव फंड्स क्यों मजबूर खरीदार होते हैं? इंडेक्स फंड का उद्देश्य बाजार को हराना नहीं बल्कि किसी निश्चित इंडेक्स को जितना संभव हो उतना करीब से फॉलो करना होता है। अगर इंडेक्स में किसी शेयर का वजन बढ़ता है तो फंड मैनेजर को उसी अनुपात में उस शेयर की हिस्सेदारी बढ़ानी पड़ती है। इसी वजह से इंडेक्स रीबैलेंसिंग के दिन पहले से अनुमान लगाया जा सकता है कि किस शेयर में संभावित खरीद या बिक्री होगी। हेज फंड इसी अनुमान का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। लेकिन यह रणनीति जोखिम मुक्त नहीं होती। अगर उस दिन कोई बड़ा निवेशक अचानक भारी शेयर बेच दे तो अनुमानित मांग का फायदा खत्म हो सकता है। Adani Energy Solutions में यही परिस्थिति देखने को मिली। GQG की बिक्री क्यों बनी बड़ा फैक्टर? बाजार की सामान्य ट्रेडिंग में कुछ लाख शेयरों की खरीद-बिक्री का असर सीमित रह सकता है। लेकिन करीब 2.19 करोड़ शेयर एक साथ बिक्री के लिए आने का अर्थ है बाजार को अचानक भारी अतिरिक्त सप्लाई संभालनी पड़ी। भले ही पैसिव फंड्स खरीदारी कर रहे हों, उनके सामने इतनी बड़ी सप्लाई आने से कीमत को ऊपर जाने के लिए जरूरी डिमांड-सप्लाई बैलेंस बदल गया। इसने उन ट्रेडर्स को सबसे ज्यादा प्रभावित किया जिन्होंने यह मानकर पहले शेयर खरीद रखे थे कि आखिरी समय में इंडेक्स फंड्स उनसे ऊंचे भाव पर खरीदेंगे। क्या हेज फंड्स को वास्तव में नुकसान हुआ? रिपोर्ट्स में कहा गया है कि GQG की अप्रत्याशित बिक्री ने हेज फंड्स की रणनीति बाधित की। हालांकि सभी हेज फंड्स को कितनी रकम का नुकसान हुआ, इसकी कोई सार्वजनिक समेकित संख्या उपलब्ध नहीं है। हर फंड की खरीद कीमत, शेयर संख्या और हेजिंग रणनीति अलग हो सकती है। कुछ फंड्स ने घाटे में पोजीशन बंद की हो सकती है, जबकि कुछ ने आगे के लिए शेयर रखे होंगे। इसलिए ‘हेज फंड्स को झटका’ का मतलब मुख्य रूप से उनके अपेक्षित रीबैलेंसिंग ट्रेड का बिगड़ना है, न कि सभी फंड्स को किसी निश्चित समान रकम का नुकसान होना। अडानी समूह के लिए इसका क्या मतलब? बाजार में शेयरधारक की बिक्री और कंपनी के बुनियादी कारोबार को अलग-अलग समझना जरूरी है। GQG की कथित शेयर बिक्री से Adani Energy Solutions के ऑपरेशन, आय या संपत्तियों में सीधे कोई बदलाव नहीं होता। शेयर बाजार में एक निवेशक शेयर बेचता है तो कोई दूसरा निवेशक उन्हें खरीदता है। इसलिए निवेशकों के लिए लंबे समय में कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन, कर्ज, कैश फ्लो, नए प्रोजेक्ट और मुनाफे को देखना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा। हालांकि बड़े विदेशी शेयरधारक की हिस्सेदारी में बदलाव से बाजार की धारणा पर अल्पकालिक असर जरूर पड़ सकता है। 2023 में GQG ने दिखाई थी बड़ी हिम्मत GQG Partners और अडानी समूह का संबंध इसलिए खास माना जाता है क्योंकि उसने उस वक्त निवेश किया था जब Hindenburg रिपोर्ट के बाद अडानी समूह के शेयर भारी दबाव में थे। उस समय अडानी समूह की मार्केट वैल्यू में करीब 150 अरब डॉलर तक की गिरावट हुई थी। समूह ने Hindenburg के आरोपों को खारिज किया था। GQG की एंट्री को तब अडानी समूह के लिए विदेशी संस्थागत निवेशकों के भरोसे के बड़े संकेत के रूप में देखा गया था। इसी इतिहास के कारण 2026 की इस कथित बिक्री ने बाजार में अतिरिक्त दिलचस्पी पैदा की। अडानी शेयरों में हाल में बढ़ी हलचल पिछले कुछ दिनों में अडानी ग्रुप फिर बाजार की सुर्खियों में रहा है। एक तरफ MSCI रीबैलेंसिंग से शेयरों में भारी वॉल्यूम देखने को मिला तो दूसरी तरफ अडानी-Hindenburg मामले में SEBI की कार्रवाई भी चर्चा में है। SEBI उन ट्रेड्स से कथित रूप से हुए लाभ की वसूली के लिए प्रक्रिया आगे बढ़ा रहा है जिन्हें नियामक Hindenburg की रिपोर्ट प्रकाशित होने से पहले मिली गैर-सार्वजनिक जानकारी से जुड़ा मानता है। SEBI ने 2024 में कहा था कि Kingdon Capital Management ने Mauritius स्थित एक फंड के जरिए Adani शेयरों में शॉर्ट पोजीशन बनाई थी। नियामक के मुताबिक छह संस्थाओं ने इन शॉर्ट ट्रेड्स से लगभग 22.25 मिलियन डॉलर का लाभ कमाया था। संबंधित पक्षों ने गलत काम से इनकार किया है। निवेशकों को क्या समझना चाहिए? Adani Energy Solutions में हुई बड़ी बिक्री से एक अहम बाजार सबक भी मिलता है। इंडेक्स रीबैलेंसिंग जैसी घटनाओं के आसपास ट्रेडिंग में बहुत ज्यादा वॉल्यूम और अस्थिरता हो सकती है। भले ही संभावित पैसिव फंड खरीद का अनुमान पहले से हो, लेकिन दूसरे बड़े शेयरधारक की गतिविधि पूरा समीकरण बदल सकती है। यानी ‘इंडेक्स में वजन बढ़ेगा तो शेयर जरूर चढ़ेगा’ जैसी सीधी धारणा हमेशा सही नहीं होती। बड़े निवेशकों की बिक्री, डेरिवेटिव पोजीशन और बाजार की लिक्विडिटी भी कीमत को प्रभावित करते हैं। आगे किस पर रहेगी नजर? अब बाजार की नजर सबसे पहले GQG Partners की अडानी समूह में बची हुई हिस्सेदारी पर रहेगी। अगर आने वाले दिनों में उसकी ओर से और बड़ी बिक्री सामने आती है तो बाजार इसे व्यापक पोर्टफोलियो बदलाव के तौर पर देख सकता है। अगर यह केवल एक सीमित रीबैलेंसिंग ट्रेड साबित होता है तो इसकी व्याख्या अलग होगी। इसके अलावा Adani Energy Solutions के शेयर में संस्थागत खरीदारी और शेयरहोल्डिंग पैटर्न भी महत्वपूर्ण रहेंगे। कुल मिलाकर 31 अगस्त का घटनाक्रम दिखाता है कि बड़े संस्थागत निवेशक की एक अप्रत्याशित बिकवाली किस तरह पूरी बाजार रणनीति को उलट सकती है। पैसिव फंड्स की संभावित खरीद पर दांव लगाए बैठे हेज फंड्स को उम्मीद थी कि MSCI रीबैलेंसिंग उन्हें आसान एग्जिट देगी, लेकिन GQG से जुड़ी भारी सप्लाई ने वह खेल बिगाड़ दिया। अडानी ग्रुप के मुश्किल दौर में महत्वपूर्ण निवेशक बनकर सामने आए GQG Partners का नाम इस वजह से और ज्यादा चर्चा में है। अब बाजार यह देखेगा कि करीब 2.19 करोड़ शेयरों की बिक्री केवल पोर्टफोलियो मैनेजमेंट थी या अडानी कंपनियों में GQG की हिस्सेदारी को लेकर आगे भी कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलता है।







